Self discipline tips from Gita: सफ़लता आज के समय में अति आवश्यक है, यानी एक बेहतर जीवन के लिए सफ़ल होना जरूरी है। सफलता पाने के लिए केवल प्रतिभा ही काफी नहीं होती बल्कि आत्म-अनुशासन (Self-discipline) की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। आत्म-अनुशासन एक ऐसा सफ़लता का कारक है जो हमे जीत के नजदीक जल्दी ला देता है। हम अक्सर अपने लक्ष्यों को निर्धारित करते हैं लेकिन आलस्य और विकर्षणों के कारण उनसे भटक जाते हैं। आलस्य और विकर्षणों ही आज के समय में 90 फीसदी असफ़लता का कारण है।

श्रीमद्भगवद्गीता न केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ है अर्थात यह मानव जीवन शैली यानी मनोविज्ञान का एक उत्कृष्ट अध्ययन भी है। यदि आप अपने जीवन को व्यवस्थित करना चाहते हैं तो “Self discipline tips from Gita” आपके लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कई सारे उपदेश दिए हैं, जो हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण बातें है।
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मन का निग्रह: “Self discipline tips from Gita” का पहला चरण
गीता के छठे अध्याय में आत्म-संयम यानी आत्म-अनुशासन पर विस्तार से चर्चा की गई है। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि “बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।” अर्थात जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसके लिए वह मन सबसे अच्छा मित्र है लेकिन जो ऐसा नहीं कर पाया, उसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु है। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, “मानव का सबसे बड़ा शत्रु भी उसका मन है और मानव का सबसे बड़ा मित्र भी मन ही हो सकता है। एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन को अपने वश में रखता है, मन तो चंचल होता है, वह सही गलत का फर्क़ नहीं समझता, बस भटकता रहता है।”
अर्थात अगर आपने अपने मन को वश में नहीं किया तो आपके सफ़लता में आपका मन सबसे बड़ा बाधा बन रहा है। एक योग्य व्यक्ति को अपने मन को नहीं, बल्कि अपने कर्म की पहचान करनी चाहिए। और अपने कर्म पथ पर कर्मठ हो कर आगे बढ़ना चाहिए।
अभ्यास और वैराग्य

अर्जुन जब श्री कृष्ण से शिकायत करते हैं कि मन हवा की तरह चंचल है तभी भगवान श्री कृष्ण “Self discipline tips from Gita” के अंतर्गत दो शक्तिशाली हथियार देते हैं: अभ्यास (निरंतर प्रयास) और वैराग्य (अनासक्ति)। यह दोनों हमारे जीवन का वह हथियार है, जो हमारे जीवन को सफ़लता के मार्गदर्शन करने का काम करता है और जल्दी सफ़लता तक पहुचा देता है। आत्म-अनुशासन रातों-रात नहीं आता, इसके लिए हमें निरंतर प्रयास करना होता है। जब भी मन भटके, उसे वापस अपने लक्ष्य पर लाना ही ‘अभ्यास’ है। और जिन चीज़ों से मन भटकता है, उनके प्रति उदासीन होना ‘वैराग्य’ है।
अर्थात अभ्यास और वैराग्य जितना सुनने में आसान और सरल है, वास्तव में इसे जीवन में लाना उतना ही कठिन है। ज्यादातर लोग इसकी शुरूआत तो कर देते हैं, लेकिन लंबे समय तक टिक नहीं पाता है। और फिर से भटक जाता है।
इंद्रियों पर नियंत्रण
एक अनुशासित जीवन के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण आवश्यक है। जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही एक बुद्धिमान व्यक्ति को प्रलोभनों से अपनी इंद्रियों को हटा लेना चाहिए। यह “Self discipline tips from Gita” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो हमें बाहरी आकर्षणों के बजाय अपने आंतरिक लक्ष्य पर केंद्रित रहना सिखाता है।
संतुलित जीवनशैली: “Self discipline tips from Gita” का व्यावहारिक रूप
अनुशासन का अर्थ केवल कठोर तपस्या नहीं है बल्कि संतुलन है। गीता अतिवाद के खिलाफ चेतावनी देती है। गीता के अनुसार संतुलन जरूरी है और अतिवाद जीवन के लिए खतरा है।

’युक्ताहारविहारस्य’ का सिद्धांत
श्री कृष्ण कहते हैं, “युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।” यानी जिसका आहार और विहार (घूमना-फिरना) संतुलित है और जो अपने कार्यों में नियमित है, उसी का योग सिद्ध होता है। “Self discipline tips from Gita” हमें सिखाती है कि न तो बहुत अधिक सोना चाहिए और न ही बहुत कम; न बहुत अधिक खाना चाहिए और न ही भूखा रहना चाहिए। यह संतुलन ही आत्म-अनुशासन की नींव है।
नियमितता और संकल्प
आत्म-अनुशासन कोई एक दिन में बनने वाली आदत नहीं बल्कि एक सतत साधना और जीवनशैली है। गीता हमें यह सिखाती है कि अनुशासन की शुरुआत कर्तव्यभाव से होती है यानी वह काम करना जो सही है, न कि वह जो हमें आसान या सुविधाजनक लगता है। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं, आलस्य और तत्काल सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर अपने स्वधर्म का पालन करता है, तब उसके भीतर धीरे-धीरे ऐसा अनुशासन विकसित होता है जो किसी भी परिस्थिति में उसे डगमगाने नहीं देता। गीता बताती है कि सच्चा अनुशासन तब जन्म लेता है जब हम परिणामों की चिंता छोड़कर केवल कर्म पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
“Self-discipline tips from Gita” का पालन करने वाला व्यक्ति अपनी भावनाओं का दास नहीं बल्कि उनका स्वामी बन जाता है। वह मन के विचलनों, जैसे क्रोध, मोह, टालमटोल, भय या उत्साह; इन सब पर नियंत्रण रखता है और अपने लक्ष्य पर अडिग रहता है। ऐसा व्यक्ति हर चुनौती को विकास का अवसर समझता है क्योंकि गीता के अनुसार बाहरी स्थितियाँ कभी भी हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन हमारा मन और हमारे कर्म हमेशा हमारे हाथ में होते हैं। जब मन नियंत्रित हो जाता है तो जीवन की दिशा भी स्वतः ही स्पष्ट, दृढ़ और उद्देश्यपूर्ण हो जाती है।
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निष्कर्षतः श्रीमद्भगवद्गीता हमें सिखाती है कि आत्म-अनुशासन कोई सजा नहीं, बल्कि स्वयं को श्रेष्ठ बनाने का माध्यम है। मन को साधकर, संतुलित जीवन जीकर और निरंतर अभ्यास करके हम किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। “Self discipline tips from Gita” को अपनाकर आप अपने जीवन को एक नई दिशा और ऊर्जा दे सकते हैं।