आज प्यार बदनाम है, आखिर क्यों? क्या आप जिससे प्यार करते हो उसपर आपको भरोसा है? शायद हाँ या फिर शायद ना। लेकिन जिस देश का नीव ही प्रेम पर हो फिर वहाँ प्रेम और प्यार में इतनी गंदगी कैसे बढ़ रहा है? आज विषाक्त संबंध (toxic relationship) जैसे शब्दों को अपने सुना ही होगा, यह वही शब्द है जो तलाक दर (जिसका की कभी हिन्दू धर्म में अस्तित्व ही नहीं था) को भारत में बढ़ा रहा है और पश्चिमी संस्कृति को भारत में थोपा जा रहा है; कैसे यह हो रहा है, इस सब पर आज हम बात करेंगे।
उससे पहले क्या आपको यह मालूम है कि भारत में तलाक दर सोशल मीडिया के आने के बाद बढ़ा है या घटा है; आप जब यह जानेंगे तो हैरान रह जाओगे, भारत में आज 70 से 80 फीसदी सामग्री निर्माता (वीडियो, आर्टिकल आदि) सिर्फ अपने पहुंच बढ़ाने के लिए गलत ज्ञान दे रहे हैं, यहाँ तक कि ज्यादातर मनोचिकित्सक और कई डॉक्टर भी यही कर रहे हैं।

आज हम जितने भी सोशल मीडिया उपयोग करते हैं चाहे बात इंस्टाग्राम की हो, फेसबुक की हो या फिर बात यूट्यूब का ही क्यूँ ना हो। इसमे से एक भी प्लैटफ़ॉर्म का एल्गोरिदम भारतीय संस्कृति को जल्दी बढ़ावा नहीं देता है लेकिन पश्चिमी संस्कृति को बहुत जल्दी फैलाया जाता है। अब इस कलयुग में पैसा को ही भगवान बना दिया गया है, तो लोग इसे पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार तो रहेंगे ही। तो आइये कुछ बातों को विस्तार से समझते हैं:
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प्यार का असल मतलब क्या होता है?
दुनिया का सबसे पुराना धर्म ग्रथों के अनुसार यानी प्यार का असल मतलब हिन्दू धर्म के अनुसार है जो निस्वार्थ हो, अपेक्षाओं से मुक्त हो और जहाँ केवल समर्पण, जन्मों-जन्मों का एक दूसरे से नाता और आत्मा की एकता हो। बाद बाकि आज प्यार के जितने कि अर्थ निकाला गया है वह कलयुग के अंत के साथ ही अंत हो जाएगा, लेकिन प्यार का यह अर्थ युगों से चला आ रहा है और आगे भी हमेशा रहेगा।
क्यूँ प्यार बदनाम है?
इसको समझने के लिए हमें तो पहले यह समझना होगा, आख़िर किसी का बदनामी होता कब और क्यों हैं। देखो बदनामी किसी का भी तब होता है जब वह गलत में ज्यादा दिख रहा हो, और आज प्यार का मतलब बदल चुका है। हर कोई प्यार को अपने फायदे, नुकसान और अपने सोच के हिसाब से उसका मतलब निकाल भी रहा है और बता रहा है।
जहाँ प्यार का असल अर्थ है जो निस्वार्थ हो, अपेक्षाओं से मुक्त हो अर्थात जहाँ केवल समर्पण और आत्मा की एकता हो। जबकि आज प्यार सिर्फ़ जिस्मों तक ही सीमित रह गया है, लोग प्यार जिस्मों के प्यास बुझाने के लिए करते हैं जो कि वास्तव में प्यार होता ही नहीं है, बल्कि यह एक अधार्मिक कामों में से एक है। शारीरिक संबंध तो प्यार का एक मात्र बहुत ही छोटा अंश है; जिसमें शादी से पहले करना अधार्मिक और राक्षसी बताया गया है। वैसे भी कहा गया है कि “धर्म के राह पर चलना आसान नहीं होता है और अधर्म की राह पर चलना सबसे ज्यादा आसान होता है।”

विषाक्त संबंध (Toxic relationship) क्या होता है? और इसका समाधान क्या है?
विषाक्त संबंध का मतलब क्या है?
विषाक्त संबंध बाहर से प्यार जैसा दिखता है लेकिन इसकी असलियत में नियंत्रण, मनोवैज्ञानिक खेल और भावनात्मक दर्द छिपा होता है। ऐसे रिश्ते में एक साथी प्यार के नाम पर दूसरे की आज़ादी छीन लेता है; क्या पहनना है, किससे मिलना है, कहाँ जाना है, सब पर हक जताता है। धीरे-धीरे यह नियंत्रण और भावनात्मक हेरफेर व्यक्ति को खुद पर शक करने पर मजबूर कर देता है जिससे प्यार एक मानसिक बोझ बन जाता है।
ऐसे रिश्तों में भावनात्मक थकान आम बात है। इंसान सब कुछ देकर भी खाली महसूस करता है और न शांति मिलती है, न अपनापन। धीरे-धीरे वो अपने सपनों, आत्मविश्वास और पहचान को खो देता है। जो रिश्ता आपकी मुस्कान और आज़ादी छीन ले, वो प्यार नहीं बल्कि एक कैद होता है जो “फिक्र” के नाम पर आपकी रूह को बाँध लेता है।
भारत में विषाक्त संबंध का असलियत
विषाक्त संबंध का रिश्तों में होने अर्थात आपके मर्जी के खिलाफ आपसे कुछ भी करवाना या आपके बिना मर्जी जाने ही आपका भी फैसला ले लेना; जैसी चीजें शामिल होती है। वास्तव में वेस्टर्न देशो में विषाक्त संबंध ज्यादा होता है क्योंकि वहाँ का ही चलन दिया हुआ है गर्लफ्रेंड (girlfriend) और बोय़-फरेन्द (boyfriend) रखने और बनाने जैसे चीजों का। आज भी गर्लफ्रेंड और बोय़-फरेन्द वाले जोड़े को छोड़ दिया जाए तो भारत में विषाक्त संबंध जैसी चीजें ना के बराबर होता है। यानी जो गर्लफ्रेंड और बोय़-फरेन्द वाले शादी हुआ है उसको छोड़ दिया जाए तो ये सब चीजे हज़ारों में कहीं एक दिखने को मिल जाएगा।
भारत दुनिया का आज सबसे बड़ा आबादी वाला देश है और हर कोई एक जैसा नहीं होता है, यानी रामायण काल में भी माता सीता को रावण ने अपहरण किया था, और आज के समय में तो कौन है रावण और कौन है राम; यह तो बस राम ही जाने। विषाक्त संबंध वही पाया जाता है जहां राक्षसी प्रवृति का वास हो।
शादी से पहले सम्भोग और विषाक्त संबंध जैसी चीजें साफ तौर पर आपकी राक्षसी प्रवृति को दर्शाता है। जो लोग अपने मर्जी के साथ यह सब करते हैं वह एक राक्षसी प्रवृति वाला इंसान है।
विषाक्त संबंध का समाधान क्या है?

पश्चिमी देशों की सोच के अनुसार, किसी भी विषाक्त संबंध का सबसे सरल समाधान है कि अलग हो जाना। लेकिन भारतीय परंपरा और पौराणिक विश्वास का दृष्टिकोण इससे अधिक गहरा है। यहाँ रिश्तों को केवल भावनात्मक या सामाजिक जुड़ाव नहीं बल्कि कर्म और कर्तव्य का पवित्र बंधन माना जाता है। इसलिए हिंदू दर्शन कहता है कि अगर रिश्ता विषाक्त हो जाए, तब भी पहले हमें धर्म, भक्ति और धैर्य की राह से हटे बिना हर संभव प्रयास करना चाहिए कि गलतियों को सुधारा जाए, अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी जाए और अपने हक के लिए शांत लेकिन दृढ़ संघर्ष किया जाए।
जैसा कि गीता में कहा गया है: “स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः” (अध्याय 3, श्लोक 35) — यानी अपने धर्म और कर्तव्य पर अडिग रहना ही श्रेष्ठ है।
भारतीय विवाह केवल दो लोगों का साथ नहीं बल्कि दो आत्माओं और दो कुलों का पवित्र मिलन माना गया है। इसलिए इसमें जिम्मेदारी, त्याग और आत्मअनुशासन मूल आधार हैं। श्रीमद्भगवद्गीता जीवन के हर संबंध में संतुलन और कर्तव्य निभाने की प्रेरणा देती है। भगवान कृष्ण कहते हैं: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” (अध्याय 2, श्लोक 47) अर्थात हमें अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करना चाहिए, चाहे परिणाम कुछ भी हो। विवाह में भी यही सिद्धांत लागू होता है कि कोशिश, संवाद और सुधार की नीयत कभी नहीं छोड़नी चाहिए। क्यूंकि इस संसार में कुछ परफेक्ट नहीं है, सब में कुछ ना कुछ खामी होता ही होता है।
भारतीय दर्शनशास्त्र यह भी स्वीकार करता है कि पृथ्वी कर्मभूमि है; जहाँ हर व्यक्ति अपने कर्मों का फल भोगता है। अच्छे कर्म का अच्छा फल और बुरे कर्म का बुरा फल आज नहीं तो कल अवश्य मिलता है। इसलिए विषाक्त संबंध में संघर्ष करते हुए भी, भक्ति, नैतिकता और आत्मसम्मान की राह कभी नहीं छोड़नी चाहिए। अगर सारी कोशिशों के बाद भी संबंध सुधार न पाए, तब भी निर्णय धर्म और विवेक के आधार पर होना चाहिए क्योंकि संघर्ष जीवन है, परंतु धर्म के बिना संघर्ष अंधकार बन जाता है।
भारतीय लोगों के लिए: शर्म की बात
आज आप किसी दूसरे की बात को मान लेते हो, दूसरों की संस्कृति को भी अपना रहे हो और अपने ही देश की संस्कृति को दबाते जा रहे हो, आज तुम अगर इतना नीचे गिर रहे हो, अपनी संस्कृति को इतना पीछा छोड़ते जा रहे हो, सोचो तुम्हारे आने वाले पीढ़ी; कितना नीचे गिरेगा। अधार्मिक राह पर इतना भी आगे मत बढ़ जाओ कि वहां से वापस आना मुश्किल हो जाए।
ये धन, दौलत, पैसा और रुतबा अगर कमा भी लिया तो क्या, अगर सब कुछ धर्म की राहों से दूर होकर पाए हो। इससे आप अपने मन को तो खुश कर लोगे लेकिन अपने आत्मा को कभी खुश नहीं कर पाओगे। धर्म ग्रंथों का माने तो एक इंसान को दुबारा इंसान में जन्म लेने के लिए कई हजारों वर्षों के बाद मौका मिलता है। उसको ऐसे व्यर्थ नहीं जाने दो, धर्म की राह को अपनाओ। यही आपके जीवन का सबसे बड़ा जीत होगा।
प्यार की बदनामी और समाज की गंदगी क्या है? और इसका उपाय क्या है?

आज के समय में प्यार बदनाम इसलिए हो गया है क्योंकि लोग इसके असली अर्थ को भूल चुके हैं। जहाँ हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में प्रेम को निस्वार्थ, पवित्र, अपेक्षाओं से मुक्त और आत्मा की एकता बताया गया है वहीं आधुनिक समाज में इसे सिर्फ़ आकर्षण, इच्छा और शारीरिक संबंधों तक सीमित कर दिया गया है। जब प्रेम को अपनी सुविधानुसार परिभाषित किया जाने लगा तो इसका मूल स्वरूप धूमिल हो गया और लोगों में प्यार पर भरोसा कम होता चला गया।
सोशल मीडिया और पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव ने इस समस्या को और बड़ा कर दिया है। आज एल्गोरिदम वही सामग्री तेजी से फैलाते हैं जहाँ पश्चिमी सोच, कैज़ुअल रिलेशनशिप और अस्थायी आकर्षण को बढ़ावा दिया जाता है। इसके कारण युवा पीढ़ी रिश्तों को एक प्रयोग की तरह देखने लगी है जहाँ त्याग, समर्पण, धैर्य और संस्कार जैसे मूल्य पीछे छूट गए हैं। जब रिश्ते स्वार्थ, नियंत्रण, जलन और अपेक्षाओं पर टिक जाते हैं, तो प्यार गंदा लगने लगता है और लोगों को विश्वास टूटने लगता है।
भारत, जिसकी नींव ही प्रेम, त्याग और धर्म पर रही है वहाँ आज प्यार का बिगड़ना चिंताजनक है। आँकड़ों के अनुसार सोशल मीडिया के दौर में गलत और भ्रामक रिलेशनशिप सलाह ने अविश्वास, शंका और विषाक्त संबंधों को बढ़ावा दिया है। असल समस्या यह है कि लोग प्यार को समझने के बजाय उसे उपभोग की वस्तु बनाते जा रहे हैं। जब प्यार से त्याग हट जाता है, धर्म हट जाता है और आत्मा की पवित्रता हट जाती है तो उसके स्थान पर भ्रम, अधर्म और टूटे हुए रिश्ते आ खड़े होते हैं। इसलिए प्यार को बचाने के लिए उसकी असली परिभाषा, भारतीय मूल्य और आत्मिक पवित्रता को फिर से अपनाना जरूरी है।